(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Mahabharata - Drona Parva


॥ श्रीः ॥
7.177. अध्यायः 177
Mahabharata - Drona Parva - Chapter Topics
बकादिबन्धुवधाद्भीमे चिरवैरिणा अलायुधराक्षसेन सुयोधनादायोधनाक्ष्यनुज्ञामुपलक्ष्य घटोत्कचं प्रत्यभिगमनम्॥ 1 ॥


Mahabharata - Drona Parva - Chapter Text

सञ्जय उवाच। 7-177-0x(4735)(53182)
तस्मिंस्तथा वर्तमाने कर्णराक्षसयोर्मृधे।
अलायुधो राक्षसेन्द्रो वीर्यवानभ्यवर्तत॥ 7-177-1(53183)
महत्या सेनया युक्तो दुर्योधनमुपागमत्।
राक्षसानां विरूपाणां सहस्रैः परिवारितः।
नानारूपधरैर्वीरैः पूर्ववैरमनुस्मरन्॥ 7-177-2(53184)
तस्य ज्ञातिर्हि विक्रान्तो ब्राह्मणादो बको हतः।
किर्णीरश्च महातेजा हिडिम्बश्च सखा तदा॥ 7-177-3(53185)
स दीर्घकालाध्युपितं पूर्ववैरमनुस्मरन्।
विज्ञायैतन्निशायुद्धं जिघांसुर्भीममाहवे॥ 7-177-4(53186)
स मत्त इव मातङ्गः सङ्क्रुद्व इव चोरगः।
दुर्योधनमिदं वाक्यमब्रवीद्युद्वलालसः॥ 7-177-5(53187)
विदितं ते महाराज यथा भीमेन राक्षसाः।
हिडिम्बबककिर्मीरा निहता मम बान्धवाः॥ 7-177-6(53188)
परामर्शश्च कन्याया हिडिम्बायाः कृतः पुरा।
किमन्यद्राक्षसानन्यानस्मांश्च परिभूय ह॥ 7-177-7(53189)
तमहं सगणं राजन्सवाजिरथकुञ्जरम्।
हैडिम्बिं च सहामात्यं हन्तुमभ्यागतः स्वयम्॥ 7-177-8(53190)
अद्य कुन्तीसुतान्सर्वान्वासुदेवपुरोगमान्।
हत्वा सम्भक्षयिष्यामि सर्वैरनुचरैः सह॥ 7-177-9(53191)
निवारय बलं सर्वं वयं योत्स्याम पाण्डवान्॥ 7-177-10(53192)
तस्यैतद्वचनं श्रुत्वा हृष्टो दुर्योधनस्तदा।
प्रतिपूज्याब्रवीद्वाक्यं भ्रातृभिः परिवारितः॥ 7-177-11(53193)
त्वां पुरस्कृत्य सगणं वयं योत्स्यामहे परान्।
न हि वैरान्तमनसः स्थास्यन्ति मम सैनिकाः॥ 7-177-12(53194)
एवमस्त्विति राजानमुक्त्वा राक्षसपुङ्गवः।
अभ्ययात्त्वरितो भैमिं सहितः पुरुषादकैः॥ 7-177-13(53195)
दीप्यमानेन वपुषा रथेनादित्यवर्चसा।
तादृशेनैव राजेन्द्र यादृशेन घटोत्कचः॥ 7-177-14(53196)
तस्याप्यतुलनिर्घोपो बहुतोरणचित्रितः।
ऋक्षचर्मावनद्वाङ्गो नल्वमात्रो महारथः॥ 7-177-15(53197)
तस्यापि तुरगाः शीघ्रा हस्तिकायाः खरस्वनाः।
शतं युक्ता महाकाया मांसशोणितभोजनाः॥ 7-177-16(53198)
तस्यापि रथनिर्घोपो महामेघरवोपमः।
स्यापि सुमहच्चापं दृढज्यं कनकोज्ज्वलम्॥
तस्याप्यक्षसमा बाणा रुक्म पुङ्खाः शिलाशिताः।
सोऽपि वीरो महाबाहुर्यथैव स घटोत्कचः॥ 7-177-17(53199)
तस्यापि गोमायुबलाभिगुप्तो
बभूव केतुर्ज्वलनार्कतुल्यः।
स चापि रूपेण घटोत्कचस्य
श्रीमत्तमो ह्यन्तकसन्निकाशः॥ 7-177-19(53200)
दीप्ताङ्गदो दीप्तकिरीटमाली
बद्धस्रगुष्णीषनिबद्धखङ्गः।
गदी भुशुण्डी मुसली हली च
शरासनी वारणतुल्यवर्ष्मा॥ 7-177-20(53201)
रथेन तेनानलवर्चसा तदा
विद्रावयन्पाण्डववाहिनीं ताम्।
रराज सह्ख्ये परिवर्तमानो
विद्युन्माली मेघ इवान्तरिक्षे॥ 7-177-21(53202)
ते चापि सर्वप्रवरा नरेन्द्रा
महाबला वर्मिमश्चर्मिणश्च।
हर्षान्विता युयुधुस्तस्य राजन्
समन्ततः पाण्डवयोधवीराः॥ ॥ 7-177-22(53203)

इति श्रीमन्महाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि चतुर्दशरात्रियुद्धे सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 177 ॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.